महाभारत में शौर्य का इतिहास रच चुका बागपत अब कालापानी की सजा काट रहा है। एनजीटी के आदेश के बावजूद हिडन, कृष्णा और काली नदी किनारे के 50 गांवों को न स्वच्छ पानी मिला, न मरीजों को इलाज। कल्पना से ज्यादा डरावनी है हकीकत। लोग पानी के नाम पर जहर गटक रहे हैं, जिससे हंसती-खेलती जिदगी की डोर टूट रही है। कृष्णा नदी का जहरीला पानी धीरे-धीरे गांवों में फैल रहा है और कैंसर जैसी सैकड़ों गंभीर बीमारियों को जन्म दे रहा है। हालात इतने भयावह हैं कि लोगों की जिंदगी समय से पहले ही खत्म हो रही है।
बागपत के दोघट क्षेत्र के गंगनौली गांव की स्थिति सबसे ज्यादा चिंताजनक है। बीते कुछ वर्षों में यहां सैकड़ों लोगों की मौत कैंसर के कारण हो चुकी है, जबकि दर्जनों लोग आज भी इस जानलेवा बीमारी से जूझ रहे हैं। गांव के लोग बताते हैं कि पीने के पानी का एकमात्र सहारा हैंडपंप और नलकूप हैं, जिनका पानी पूरी तरह दूषित हो चुका है। इसी पानी के इस्तेमाल से बीमारी घर-घर फैल रही है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जलस्तर और पानी की शुद्धता को लेकर प्रशासन पूरी तरह उदासीन बना हुआ है। न तो पानी की नियमित जांच हो रही है और न ही शुद्ध पेयजल की कोई ठोस व्यवस्था की गई है। हालात यह हैं कि लोग मजबूरी में जहरनुमा पानी पीने को विवश हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि नेता और जनप्रतिनिधि चुनाव के समय वोट मांगने जरूर आते हैं, लेकिन समस्या के समाधान की बात आते ही सब चुप्पी साध लेते हैं। कृष्णा और हिंडन नदी के प्रदूषण का असर 50 से ज्यादा गांवों पर पड़ रहा है, जहां लोग गंदे पानी और बीमारियों के साये में जीने को मजबूर हैं।
अब सवाल यह है कि आखिर कब जागेगा प्रशासन और कब मिलेगी लोगों को इस जलजहर से मुक्ति।









