मेरठ ‘जीते जी तेरहवीं’—सेंट्रल मार्केट की महिलाओं का अनोखा और दर्दनाक विरोध!
आत्मसम्मान की ‘आहुति’ और व्यापार का ‘ब्रह्मभोज’; जनप्रतिनिधियों की चुप्पी पर महिलाओं ने मरण जैसा जताया शोक
मेरठ के मशहूर सेंट्रल मार्केट में चल रहा विवाद अब केवल एक व्यापारिक झगड़ा नहीं, बल्कि आत्मसम्मान की एक ऐसी जंग बन गया है जिसने पूरे शहर को झकझोर कर रख दिया है। आंदोलन के 13वें दिन, धरने पर बैठी महिलाओं ने विरोध का ऐसा रास्ता अपनाया जो आमतौर पर किसी की मृत्यु के बाद देखा जाता है। महिलाओं ने अपने विश्वास, आत्मसम्मान और व्यापार की ‘तेरहवीं’ कर प्रशासन और नेताओं के प्रति अपना तीखा आक्रोश प्रकट किया।
बुधवार सुबह शास्त्रीनगर स्थित धरना स्थल पर माहौल बेहद गमगीन और गंभीर था। महिलाओं ने बाकायदा हवन-पूजन का आयोजन किया, लेकिन यह किसी शुभ कार्य के लिए नहीं बल्कि अपनी ‘मरी हुई उम्मीदों’ की शांति के लिए था। हवन में आहुति देते हुए प्रदर्शनकारी महिलाओं ने कहा कि प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की बेरुखी ने उनके व्यापार और भरोसे की हत्या कर दी है। हिंदू परंपराओं में तेरहवीं मृत्यु के बाद का अंतिम संस्कार होती है। महिलाओं ने इस प्रतीक का उपयोग कर यह संदेश दिया कि
उनका आत्मसम्मान अब सिस्टम की फाइलों में दम तोड़ चुका है।
नेताओं पर किया गया विश्वास खत्म हो गया है। सेंट्रल मार्केट में सालों से चला आ रहा व्यापार अब उजड़ने की कगार पर है।
हवन के पश्चात ‘ब्रह्मभोज’ का भी आयोजन किया गया, जिसने वहां से गुजरने वाले हर व्यक्ति को ठहरने पर मजबूर कर दिया।
आंदोलनकारियों महिलाओं का सबसे ज्यादा गुस्सा स्थानीय जनप्रतिनिधियों पर फूटा। महिलाओं का कहना है कि संकट की इस घड़ी में कोई भी नेता उनकी सुध लेने नहीं आया।
”जब चुनाव होते हैं तो नेता घर-घर आते हैं, आज जब हमारी रोजी-रोटी और सम्मान पर बन आई है, तो सबने आंखों पर पट्टी बांध ली है।”
मेरठ सेंट्रल मार्केट न केवल व्यापार का केंद्र है बल्कि शहर की धड़कन भी है। 13 दिनों से जारी इस गतिरोध ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुँचाई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन ने जल्द ही कोई ठोस समाधान नहीं निकाला, तो यह ‘प्रतीकात्मक आक्रोश’ आने वाले समय में एक बड़े जन-आंदोलन का रूप ले सकता है, जिसका सीधा असर भविष्य के चुनावों और शहर की शांति व्यवस्था पर पड़ेगा।
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