जमीनी अहमियत ने रिश्तों को खोया, 38 घंटे तक रूका रहा अंतिम संस्कार, बहिन से भाइयों ने ली जमीन वापस, फिर हुआ अंतिम संस्कार…रजिस्ट्री के इंतजार में दो दिन तक रखा रहा पिता का शव…

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Edit by – Dhirendra Raikwar…

 

मौत के बाद जमीनी महत्व

 

झाॅसी मे समथर थाना क्षेत्र के ग्राम चिरगांव खुर्द से सामने आई यह खबर सिर्फ एक जमीन के विवाद की कहानी नहीं है, बल्कि यह सवाल भी खड़ा करती है कि आखिर जमीन का महत्व इंसानी रिश्तों और एक व्यक्ति की मौत के बाद कितना भारी पड़ सकता है।

यहां एक बुजुर्ग की मौत के बाद उनका अंतिम संस्कार करीब 38 घंटे तक रुका रहा। वजह बताई जा रही है पिता की पांच बीघा जमीन में से दो बीघा जमीन को लेकर परिवार के भीतर चल रहा विवाद। परिजनों के मुताबिक, अंतिम संस्कार से पहले मृतक के दोनों बेटे अपनी बहन को लेकर दो बीघा जमीन भाइयों के नाम वापस कराने के लिए रजिस्ट्रार कार्यालय के चक्कर लगाते रहे।

मामला ग्राम चिरगांव खुर्द का है, जहां निवासी ठाकुरदास कुशवाहा की गुरुवार सुबह करीब चार बजे मौत हो गई। बताया गया कि ठाकुरदास के दो पुत्र और तीन पुत्रियां हैं। पिता की मौत के बाद जहां परिवार को अंतिम संस्कार की तैयारी करनी थी, वहीं जमीन को लेकर चल रहा विवाद परिवार के लिए सबसे बड़ी चिंता बन गया।

मृतक के पुत्र विवेक के अनुसार, उनकी दूसरे नंबर की बहन अंगूरी ने पिता की पांच बीघा जमीन में से करीब दो बीघा जमीन अपने नाम करा ली थी। परिवार में इसी जमीन को भाइयों के नाम वापस कराने को लेकर बात चल रही थी।

परिजनों का कहना है कि गुरुवार दोपहर दोनों भाई अपनी बहन अंगूरी को साथ लेकर मोठ स्थित रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंचे। मकसद था कि दो बीघा जमीन भाइयों के नाम वापस कराई जा सके। लेकिन वहां ओटीपी नहीं आने की वजह से रजिस्ट्री की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी।

इधर घर पर पिता का शव अंतिम संस्कार का इंतजार कर रहा था। शाम तक परिजन अंतिम संस्कार की तैयारी करते रहे, लेकिन किसी कारणवश संस्कार नहीं हो सका। इसके बाद अगले दिन सुबह अंतिम संस्कार करने की बात तय हुई।

लेकिन शुक्रवार की सुबह भी परिवार की परेशानी खत्म नहीं हुई। दोनों भाई एक बार फिर अपनी बहन को लेकर रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंच गए। इस बार तकनीकी समस्या और सर्वर की दिक्कत सामने आ गई। परिजनों के मुताबिक, पूरे दिन इंतजार के बावजूद रजिस्ट्री नहीं हो सकी।

सोचिए… एक तरफ घर में पिता का शव रखा था, दूसरी तरफ जमीन के कागजों की प्रक्रिया पूरी कराने के लिए परिवार कार्यालय के चक्कर काट रहा था। घंटों इंतजार के बाद दोनों भाई देर शाम निराश होकर वापस घर लौटे और अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू की।

लेकिन शायद परिवार की परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई थी।

जैसे ही अंतिम संस्कार की तैयारी शुरू हुई, अचानक बारिश ने भी मुश्किल बढ़ा दी। गांव में मुक्तिधाम की व्यवस्था नहीं होने के कारण मृतक के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को करीब पांच किलोमीटर दूर समथर कस्बे स्थित मुक्तिधाम जाना पड़ा।

इसके बाद ठाकुरदास कुशवाहा का अंतिम संस्कार उनकी मौत के करीब 38 घंटे बाद किया जा सका।

अब इस पूरे घटनाक्रम को लेकर गांव और आसपास के इलाके में चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर जमीन का विवाद परिवार को किस मोड़ तक ले गया? क्या दो बीघा जमीन वापस कराने की प्रक्रिया इतनी जरूरी हो गई कि पिता के अंतिम संस्कार से पहले भी रजिस्ट्री कार्यालय के चक्कर लगाने पड़े?

हालांकि, पूरे मामले में सामने आई बातें परिजनों के कथन और उपलब्ध जानकारी पर आधारित हैं। जमीन के दस्तावेजों और रजिस्ट्री की वास्तविक स्थिति की पुष्टि संबंधित अभिलेखों और अधिकारियों से ही हो सकेगी।

फिलहाल यह मामला गांव में चर्चा का विषय बना हुआ है। एक पिता की मौत… घर में अंतिम संस्कार का इंतजार… और दूसरी तरफ दो बीघा जमीन को लेकर कागजी प्रक्रिया।

सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है… सवाल यह भी है कि रिश्तों के बीच जमीन की अहमियत आखिर कहां तक पहुंच गई?

38 घंटे बाद ठाकुरदास का अंतिम संस्कार तो हो गया, लेकिन यह घटनाक्रम पीछे कई सवाल छोड़ गया है—क्या जमीन का विवाद परिवार को जोड़ता है या रिश्तों में दरार पैदा करता है? और क्या इंसान की मौत के बाद भी जमीन का हिसाब-किताब इतना जरूरी हो सकता है कि अंतिम संस्कार तक इंतजार करना पड़े?

समथर के चिरगांव खुर्द से सामने आया यह मामला फिलहाल इसी सवाल के साथ लोगों के बीच चर्चा में है।

News 30 Express
Author: News 30 Express

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