ईश्वरीय ज्ञान की लौ — मातेश्वरी सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धा-संवेदना…

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

 

“ईश्वरीय ज्ञान की लौ — मातेश्वरी सरस्वती जी की पुण्यतिथि पर श्रद्धा-संवेदना”

 

24 जून… तारीख चाहे जो भी हो… पर ब्रह्माकुमारी परिवार के लिए यह दिन केवल एक स्मृति नहीं, एक प्रेरणा बन चुका है।
प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय की प्रथम प्रशासिका—मातेश्वरी जगदंबा सरस्वती जी की पुण्यतिथि को, आज मतानपुर के मौत सेंटर में आध्यात्मिक ज्ञान दिवस के रूप में मनाया गया।

 

कार्यक्रम की शुरुआत मातेश्वरी जी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ हुई।
फूलों की पंखुड़ियों में भी जैसे उनकी स्मृति बसी हो… और वातावरण में उनकी वाणी की गूंज हो—”ओम् शांति…”

ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी ने मातेश्वरी जी की विलक्षण विशेषताओं को साझा करते हुए बताया—
कि जब जगदंबा सरस्वती जी ‘ओम्’ का उच्चारण करती थीं, तो पूरा वातावरण मानो शांति में विलीन हो जाता था।
बचपन में ही उनकी बुद्धि समुद्र जैसी गहराई लिए हुए थी—और शायद यही कारण था कि उन्हें ‘ओम राधे’ के नाम से भी जाना गया।

ब्रह्मा बाबा ने जब ब्रह्माकुमारी संस्था की नींव 1937 में रखी, तब मातेश्वरी जी को ही पहला दायित्व सौंपा गया।
तब से 1965 तक उन्होंने संगठन की बागडोर जिस अनुशासन, त्याग और समर्पण से संभाली—वह आज भी एक उदाहरण है।

“सरस्वती जी की स्मृति केवल विचार नहीं, एक अनुभव है।
उनके जीवन से हमने सीखा कि ज्ञान केवल पढ़ने की चीज नहीं, वह जीने की प्रक्रिया है।
आज भी उनका ‘ओम’ हमारे रोम-रोम में गूंजता है।”

कार्यक्रम में उपस्थित भाई-बहनों ने गहन श्रद्धा के साथ पुष्प अर्पित किए।
कुसुम से भरे हाथ, भावनाओं से भीगे नेत्र और हर चेहरे पर बस एक ही स्मृति—जगदंबा सरस्वती जी की।

मंच पर उपस्थित थे—ओंकार, शोचन बादल, मदन मोहन, रामस्वरूप, गायत्री, मिथिला, जानकी, शारदा, महादेवी, मीना, शशि, सीमा, शीला, संतोषी, कमल, आशा, नीतू, वर्षा, द्रौपदी, कुसमा, भगवती देवी और सैकड़ों अन्य सेवाधारी।

 

कार्यक्रम के अंत में प्रसाद वितरण हुआ और उपस्थितजनों ने शांत चित्त से ध्यान किया।
हर आंख बंद थी… और दिल में एक ही गूंज—“जगदंबा की दी गई शिक्षा, आज भी हमारे जीवन का दीप है।”

“एक ऐसी महिला जिन्होंने समाज में ‘आध्यात्मिक नेतृत्व’ का आधार रखा, जिनका जीवन आज भी ब्रह्माकुमारी परिवार का संबल है।
मातेश्वरी सरस्वती जी का जाना एक युग का अंत था,
लेकिन उनकी शिक्षाएँ—हर युग का आरंभ हैं।
उनकी स्मृति को हमारा नमन।

News 30 Express
Author: News 30 Express

Leave a Comment

और पढ़ें